नई दिल्ली, भारत
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत की रणनीति पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए कूटनीति और सैन्य क्षमता दोनों का संतुलन जरूरी है। भारत के पास “तर्क की शक्ति” और “शक्ति का तर्क” दोनों हैं और जरूरत पड़ने पर वह उसी भाषा का इस्तेमाल करेगा, जिसे दूसरा पक्ष समझता है।
रक्षा पर आयोजित एक कार्यक्रम में राजनाथ सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल पारंपरिक सीमाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। सुरक्षा चुनौतियां तेजी से बदल रही हैं और ड्रोन, साइबर सुरक्षा तथा आधुनिक रक्षा तकनीक अब आम चर्चा का विषय बन चुके हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को अपनी रक्षा तैयारियों को लगातार मजबूत करना होगा। इसके लिए बदलती सुरक्षा चुनौतियों को समझना और उनके अनुरूप रणनीति तैयार करना जरूरी है।
सॉफ्ट पावर और हार्ड पावर दोनों जरूरी
राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत की सॉफ्ट पावर उसकी हार्ड पावर की पूरक हो सकती है, लेकिन सैन्य शक्ति का विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कूटनीतिक प्रभाव और सैन्य क्षमता दोनों की जरूरत होती है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में शक्ति और शांति एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे हैं। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद कुछ नेतृत्वकर्ताओं ने इन दोनों विचारों को अलग-अलग करके देखने की कोशिश की।
उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि लंबे समय तक देश का नेतृत्व करने वालों में से कुछ ने यह मान लिया था कि दूसरे देश भी भारत की तरह शांति को प्राथमिकता देंगे। राजनाथ सिंह के मुताबिक, यह सोच सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त नहीं थी।
2014 के बाद बदली रणनीतिक सोच
रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रणनीतिक सोच में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास बातचीत और तर्क की क्षमता के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने की क्षमता भी है।
उन्होंने कहा कि भारत में रणनीतिक सोच की कमी कभी नहीं रही। जरूरत इस बात की है कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति और रक्षा तैयारियों को लगातार मजबूत किया जाए। 2014 के बाद देश की रणनीतिक सोच में इसी दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया है।
