UPI पर MDR शुल्क का मामला: ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर चार्ज को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई

नई दिल्ली, दिल्ली

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा। मामला ₹2,000 से अधिक के कुछ पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) डिजिटल लेनदेन पर लगाए गए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा है। इस मामले की सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकता है कि ऐसे डिजिटल भुगतानों पर प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था लागू रहेगी या इसमें कोई बदलाव होगा।

यूपीआई भारत में डिजिटल भुगतान का सबसे प्रमुख माध्यम बन चुका है और लंबे समय से आम यूजर्स के लिए यूपीआई के जरिए भुगतान को मुफ्त रखा गया है। ऐसे में ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट लेनदेन पर MDR लगाए जाने के फैसले को लेकर कारोबारियों और डिजिटल भुगतान क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है।

₹2,000 से अधिक के भुगतान पर शुल्क का प्रावधान

याचिका में केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत ₹2,000 से अधिक के कुछ खास यूपीआई पर्सन-टू-मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर MDR लगाए जाने का प्रावधान किया गया है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह शुल्क 15 अक्टूबर से लागू किए जाने की बात कही गई है। प्रस्तावित व्यवस्था में ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत तक MDR लगाया जाना है। वहीं, ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर यह शुल्क अधिकतम ₹300 तक सीमित रहेगा।

इस व्यवस्था का सीधा असर मुख्य रूप से उन कारोबारियों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर पड़ सकता है जो बड़े मूल्य के भुगतान स्वीकार करने के लिए यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं।

छह साल से अधिक समय से मुफ्त है यूपीआई

यूपीआई भुगतान लंबे समय से बिना किसी प्रत्यक्ष शुल्क के किए जा रहे हैं। इसी वजह से यूपीआई भारत में छोटे-बड़े कारोबारियों और ग्राहकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ है। चाय की दुकान से लेकर बड़े स्टोर और ऑनलाइन कारोबार तक, डिजिटल भुगतान के लिए यूपीआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।

ऐसे में MDR लागू करने का फैसला डिजिटल भुगतान व्यवस्था के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, प्रस्तावित शुल्क का ढांचा मुख्य रूप से कुछ P2M लेनदेन से संबंधित है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर यूपीआई भुगतान पर शुल्क लागू होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि ₹2,000 से अधिक के संबंधित यूपीआई मर्चेंट लेनदेन पर MDR लगाने की व्यवस्था कानूनी और नीतिगत रूप से किस तरह लागू की जा सकती है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलों के आधार पर मामले की आगे की दिशा तय हो सकती है। यदि अदालत इस व्यवस्था पर रोक लगाती है या इसमें कोई बदलाव का निर्देश देती है, तो इसका असर डिजिटल भुगतान क्षेत्र और कारोबारियों पर पड़ सकता है।

फिलहाल, आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे अहम बात यह है कि प्रस्तावित व्यवस्था विशेष प्रकार के मर्चेंट लेनदेन से संबंधित है। इसलिए इसे हर यूपीआई भुगतान पर सीधे लागू होने वाले चार्ज के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

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