सऊदी पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान की चुप्पी, क्या मक्का रक्षा समझौते की परीक्षा में फंस गया इस्लामाबाद?

Riyadh, Saudi Arabia

सऊदी अरब के दक्षिणी इलाकों पर हूती विद्रोहियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक संयुक्त रक्षा समझौता हुआ था, जिसे दोनों देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिहाज से अहम माना गया था।

मक्का में हुए इस समझौते के तहत किसी एक पक्ष पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी पक्षों पर हमला माना गया है। ऐसे में सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमलों के बीच पाकिस्तान की ओर से किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की घोषणा न होने से समझौते की प्रभावशीलता पर चर्चा तेज हो गई है।

सऊदी पर लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले

हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के आभा, खमीस मुशैत, जीजान और नजरान जैसे इलाकों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आती रही हैं। ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण सऊदी अरब को अपनी एयर डिफेंस प्रणाली को लगातार सक्रिय रखना पड़ रहा है।

इन घटनाओं के बीच मक्का के आसपास भी सुरक्षा अलर्ट को लेकर चिंता सामने आई है। ऐसे में पाकिस्तान की सैन्य भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नाटो जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का दावा

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में पेश किया गया था। समझौते का मूल सिद्धांत यह है कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में अन्य सदस्य उसकी सुरक्षा में सहयोग करेंगे।

इसी वजह से अब विशेषज्ञ यह सवाल उठा रहे हैं कि सऊदी अरब पर लगातार हमलों के बावजूद इस सामूहिक रक्षा व्यवस्था का व्यावहारिक इस्तेमाल क्यों नहीं दिखाई दे रहा है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी समझौते में सामूहिक रक्षा का प्रावधान होने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि हर हमले के बाद तत्काल विदेशी सैनिकों को युद्ध में उतार दिया जाए। प्रतिक्रिया का स्वरूप संबंधित देशों के निर्णय और सैन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

सऊदी में पाकिस्तानी सैन्य मौजूदगी

सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग रहा है। सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों की मौजूदगी और दोनों देशों के बीच प्रशिक्षण तथा सुरक्षा सहयोग भी पुराना है।

ऐसे में हूती हमलों के दौरान पाकिस्तान की सैन्य क्षमता के इस्तेमाल को लेकर चर्चाएं होना स्वाभाविक है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान ने रक्षा समझौते की किसी बाध्यता का उल्लंघन किया है।

बैठकों और बयानों तक सीमित है प्रतिक्रिया?

25 सितंबर को रियाद में तुर्किये और पाकिस्तान के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर बातचीत हुई। इस दौरान सऊदी अरब की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई।

लेकिन इसके साथ किसी तत्काल सैन्य अभियान या प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की घोषणा नहीं की गई। यही वजह है कि आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या मक्का रक्षा समझौता फिलहाल रणनीतिक संदेश और सैन्य सहयोग तक सीमित है।

दूसरी ओर, सऊदी अरब की एयर डिफेंस प्रणाली ने हूती हमलों का जवाब दिया है। ऐसे में यह भी संभव है कि रियाद फिलहाल अपनी मौजूदा रक्षा क्षमताओं के जरिए खतरे से निपटना चाहता हो।

समझौते की असली परीक्षा आगे

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की वास्तविक परीक्षा उस स्थिति में होगी जब किसी सदस्य देश को बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष सैन्य खतरे का सामना करना पड़े। मौजूदा घटनाक्रम ने हालांकि इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि समझौते की घोषणा और उसके वास्तविक सैन्य क्रियान्वयन के बीच काफी अंतर हो सकता है।

सऊदी अरब पर हूती हमले जारी रहते हैं तो आने वाले दिनों में पाकिस्तान की भूमिका पर नजर और बढ़ेगी। फिलहाल इस्लामाबाद ने सऊदी सुरक्षा के समर्थन की प्रतिबद्धता तो दोहराई है, लेकिन किसी बड़े प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप का सार्वजनिक ऐलान नहीं किया है।

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