नई दिल्ली, दिल्ली
दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर के पूरे रूट पर परिचालन शुरू होने के बाद दिल्ली-एनसीआर में सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (एनसीआरटीसी) के अनुसार, वर्तमान में करीब एक लाख यात्री रोजाना नमो भारत से सफर कर रहे हैं।
एनसीआरटीसी के प्रबंध निदेशक शलभ गोयल ने बताया कि इस सेवा ने दिल्ली, गाजियाबाद और मेरठ के बीच दैनिक आवागमन को आसान बनाया है। इसका असर केवल यात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरों के विकास, लोगों के रहने के विकल्प और पर्यावरण पर भी दिखाई दे रहा है।
दिल्ली में नौकरी, मेरठ में घर
नमो भारत की तेज कनेक्टिविटी के कारण गाजियाबाद और मेरठ के कई इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए दिल्ली आना-जाना आसान हुआ है।
मोदीनगर और बेगमपुल जैसे क्षेत्रों से दिल्ली में नौकरी करने वाले कई लोग अब दिल्ली में रहने के बजाय अपने मूल शहरों में रहना पसंद कर रहे हैं। बेहतर परिवहन सुविधा के कारण उन्हें नौकरी के लिए शहर बदलने की जरूरत कम हुई है।
इसे रिवर्स माइग्रेशन के रूप में देखा जा रहा है। यानी रोजगार के लिए महानगर की ओर जाने के बजाय लोग अपने शहरों में रहकर आसपास के बड़े शहरों में काम कर पा रहे हैं।
इस बदलाव से मेरठ एक प्रमुख आवासीय केंद्र के रूप में उभर रहा है। बेहतर कनेक्टिविटी के कारण भविष्य में शहर के आवासीय और व्यावसायिक विकास को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
टीओडी से स्टेशनों के आसपास विकास
नमो भारत कॉरिडोर के स्टेशनों के आसपास ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट यानी टीओडी को बढ़ावा दिया जा रहा है। गाजियाबाद और मेरठ के मास्टर प्लान 2031 में टीओडी को शामिल किया गया है।
इस योजना का उद्देश्य परिवहन केंद्रों के आसपास विभिन्न शहरी सुविधाओं को एक साथ विकसित करना है। इसके तहत आवासीय, कमर्शियल, शैक्षणिक और स्वास्थ्य परिसरों का विकास किया जा रहा है।
इससे लोगों को अपने दैनिक कामों के लिए लंबी दूरी की यात्रा कम करनी पड़ सकती है। स्टेशन के आसपास सुविधाएं उपलब्ध होने से सार्वजनिक परिवहन और पैदल आवागमन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
एक लाख यात्रियों का असर सड़कों पर
नमो भारत से रोजाना करीब एक लाख यात्री सफर कर रहे हैं। यदि इन यात्रियों का एक बड़ा हिस्सा पहले निजी वाहनों से यात्रा करता था तो सार्वजनिक परिवहन की ओर उनका रुख सड़कों पर निजी वाहनों का दबाव कम करने में मदद करता है।
वाहनों की संख्या कम होने से ईंधन की खपत और यातायात जाम जैसी समस्याओं पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके साथ ही वाहन उत्सर्जन में कमी आने से पर्यावरण को फायदा मिलने की संभावना है।
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी बढ़ाना प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
स्वदेशी तकनीक पर जोर
नमो भारत कॉरिडोर की तकनीकी व्यवस्था में स्वदेशी तकनीक का भी महत्वपूर्ण योगदान बताया गया है। एनसीआरटीसी के अनुसार, करीब 92 प्रतिशत तकनीक स्वदेशी है।
इसके अलावा कॉरिडोर के संचालन में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है। स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग से परियोजना को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
शहरी विकास का नया मॉडल
नमो भारत कॉरिडोर को केवल परिवहन परियोजना के तौर पर देखने के बजाय इसे क्षेत्रीय विकास के माध्यम के रूप में भी देखा जा रहा है।
एक तरफ यह दिल्ली, गाजियाबाद और मेरठ के बीच तेज कनेक्टिविटी उपलब्ध कराता है, वहीं दूसरी तरफ स्टेशनों के आसपास नए आवासीय और व्यावसायिक केंद्र विकसित होने की संभावना पैदा करता है।
टीओडी के जरिए परिवहन और शहरी विकास को एक-दूसरे से जोड़ा जा रहा है। इससे शहरों के अनियोजित विस्तार को कम करने और सार्वजनिक परिवहन आधारित विकास को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
आगे बढ़ सकता है असर
नमो भारत सेवा का इस्तेमाल बढ़ने के साथ इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और व्यापक हो सकता है। यदि लोग निजी वाहनों की जगह नियमित रूप से सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देते हैं तो इससे सड़कों पर दबाव और प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।
वहीं मेरठ और गाजियाबाद जैसे शहरों में रोजगार, आवास और अन्य सुविधाओं के विकास को भी नई गति मिल सकती है।
इस तरह दिल्ली-मेरठ नमो भारत कॉरिडोर दिल्ली-एनसीआर में केवल यात्रा का साधन नहीं रह गया है। यह सार्वजनिक परिवहन, पर्यावरण संरक्षण और नियोजित शहरी विकास को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में उभर रहा है।
