चेन्नई, तमिलनाडु। गत दिनों एक महत्वपूर्ण बैठक में एक संकल्प पारित किया गया जिसमें कहा गया कि ‘मेट्टूर बांध को कर्नाटक के जिद्दी रवैए के कारण खोल नहीं पाने से किसानों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।’ यह मामला क्षेत्रीय जल विवादों को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।
बैठक में उपस्थित DMK सांसदों ने केंद्र सरकार से मांग की कि वे जल विवादों को सुलझाने के लिए एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल का गठन करें जो मेकेदतु परियोजना से जुड़े विवादों का न्यायसंगत और शीघ्र समाधान कर सके। सांसदों का कहना है कि बिना उचित मध्यस्थता के किसानों और क्षेत्र के लोगों को हो रही आर्थिक परेशानियां गंभीर हैं और यह मुद्दा अब और टालना संभव नहीं।
मेट्टूर बांध तमिलनाडु के लिए एक अहम जल स्रोत है, जिसका पानी सिंचाई के साथ-साथ पीने के पानी की भी आपूर्ति करता है। कर्नाटक की ओर से बांध खोलने में रोक लगा देने से तमिलनाडु के कई जिलों के किसान प्रभावित हुए हैं, जिनकी फसलें संकट में हैं। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की संभावना भी जताई जा रही है।
DMK सांसदों ने यह भी स्पष्ट किया कि मेकेदतु परियोजना के चलते कर्नाटक का रुख विवादित रहा है, जिसने तमिलनाडु में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। संसदीय स्तर पर उठाई जा रही यह मांग केंद्र सरकार की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है कि वह इस तरह के विवादों के समाधान में प्रभावी और निष्पक्ष भूमिका निभाए।
सांसदों ने राज्य सरकार से भी अपील की कि वे इस मुद्दे पर केन्द्र के साथ समन्वय बढ़ाएं और किसानों के हितों को प्राथमिकता दें। मियांवती इलाके के किसानों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना सर्वोपरि है। यदि जल विवादों को समय पर हल नहीं किया गया तो यह क्षेत्रीय तनाव को और भी गहरा कर सकता है।
वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि जल विवाद सदियों से चले आ रहे हैं और इसके समाधान के लिए कानूनी, तकनीकी और कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत है। ट्रिब्यूनल के गठन से न्यायिक प्रक्रिया शुरू होगी जो अनुचित लाभों और दावों की जांच कर सकेगी। यह कदम विवाद की जड़ तक पहुंचने और ठोस समाधान खोजने में कारगर साबित हो सकता है।
इस प्रकार, मेट्टूर बांध को लेकर कर्नाटक के रुख से उत्पन्न जल संकट ने तमिलनाडु के किसानों को गहरा आघात पहुंचाया है और DMK सांसदों ने केंद्र सरकार से इसे गंभीरता से लेते हुए तुरंत प्रभाव से ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की है। यह मामला महज द्विपक्षीय विवाद नहीं रह गया है बल्कि इसका व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन गया है।
