निकोबार, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह – निकोबारी जनजाति की पारंपरिक पंचायत प्रणाली पर प्रशासन द्वारा प्रस्तावित चुनाव नियमों को लेकर विवाद तेज हो गया है। स्थानीय जनजातीय परिषदों में चुनाव के नियमों को बदलने का आरोप निकोबारी नेताओं और समुदाय के बीच भारी असंतोष पैदा कर रहा है।
वर्तमान में, निकोबारी जनजाति के नेता स्थानीय परंपराओं और समुदाय की सहमति के आधार पर चुने जाते हैं। यह चुनाव प्रक्रिया अधिकतर शामिल प्रतिनिधियों की बैठकें और परंपरागत रीति-रिवाजों पर आधारित होती हैं। इस प्रणाली में जनजातीय समुदाय स्वयं को सुरक्षित एवं सशक्त महसूस करता है, क्योंकि यह उनके सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी होती है।
प्रशासन, हालांकि, एक औपचारिक चुनाव प्रणाली लागू करने की तैयारी कर रहा है जो विभिन्न जनजातीय परिषदों के सदस्यों को निर्वाचन के माध्यम से चुना जाएगा। यह कदम प्रशासन की ओर से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से बताया जा रहा है। इसके अलावा, प्रशासन का मानना है कि औपचारिक चुनावों के जरिये विकास योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर होगा और जनप्रतिनिधियों के बीच प्रतिस्पर्धा से नेतृत्व में नयापन आएगा।
परंतु, जनजातीय नेताओं और निकोबारी समाज के लोगों का मानना है कि इस प्रकार के चुनावों से उनकी पारंपरिक स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है। वे डरते हैं कि बाहरी प्रभाव एवं राजनीतिक दबाव उनके प्राचीन सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को कमजोर कर सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि चुनावी प्रक्रिया से जातीय संप्रदायों में विभाजन बढ़ सकता है जिससे सद्भाव में कमी आ सकती है।
प्रस्तावित नियमों में ग्राम स्तर से लेकर उप जनपद तक की जनजातीय परिषदों के चुनाव की रूपरेखा दी गई है। इसमें मतदाता सूची तैयार करना, नामांकन प्रक्रिया, चुनाव आचार संहिता जैसे कई नए प्रावधान शामिल हैं जो पहले इस स्तर पर नहीं थे। इन नियमों के लागू होने पर निकोबारी जनजाति का अपनी स्वशासन व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप बढ़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर प्रशासन जनजातीय समुदाय के विचारों को ध्यान में रखकर, उनके साथ संवाद बनाकर आगे बढ़े, तो यह विवाद टाला जा सकता है। पारंपरिक संरचनाओं का आदर करते हुए आधुनिक शासन तंत्र को लागू करने की कोशिश दोनों पक्षों के लिए लाभकारी होगी।
अतः निकोबार की पारंपरिक पंचायत व्यवस्था और प्रशासन के औपचारिक चुनाव प्रस्ताव के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है ताकि निकोबारी समाज की सांस्कृतिक पहचान और स्वायत्तता सुरक्षित रह सके और विकास की संभावनाएं भी पुख्ता हों।
