महिला आरक्षण विधेयक: 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 10% से कम हैं महिला विधायक | आंकड़े

नई दिल्ली: महिला आरक्षण को लेकर देश में पिछले कई वर्षों से बात चल रही है, लेकिन संसद की महिला सदस्यता की वास्तविक तस्वीर उतनी उत्साहजनक नहीं है। हाल ही के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले सामान्य चुनावों में महिलाओं का संसद में हिस्सा कभी 15% से अधिक नहीं रहा है। यह संख्या न केवल महिला प्रतिनिधित्व की कमी को दर्शाती है, बल्कि समानता की दिशा में उठाए गए कदमों की गति पर सवाल भी खड़े करती है।

देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में महिला विधायक का प्रतिशत विशेष रूप से चिंताजनक है। 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में महिलाएं कुल विधायकों का केवल 10% से कम हिस्सा हैं। इसका अर्थ है कि उनमें से अधिकांश विधानसभा सदन पुरुषों के ही प्रभाव में हैं, जो महिलाओं की समस्याओं और उनके विकास की आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समझने में असमर्थ हो सकते हैं।

महिला आरक्षण विधेयक, जिसे संसद में कई बार लाया गया और चर्चा के दौर से गुजरा, महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में समान भागीदारी सुनिश्चित करने का एक प्रयास है। इस विधेयक के तहत सभी स्थानीय और राज्य विधायिकाओं में महिलाओं को कम से कम 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। हालांकि, इसके पारित होने में देरी और विभिन्न राजनीतिक दलों की अनिच्छा इस मुद्दे को लंबे समय तक अटका कर रखती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व न केवल सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है, बल्कि इससे नीति निर्माण में महिलाओं की दृष्टिकोण भी शामिल होती है, जो समाज के व्यापक हित में होता है। इसके अलावा, महिला नेताओं की भागीदारी से युवा लड़कियों को भी प्रेरणा मिलती है कि वे राजनीतिक क्षेत्र में कदम बढ़ाएं।

अब समय आ गया है कि सरकार और राजनीतिक दल महिला आरक्षण विधेयक को प्राथमिकता दें और इसे शीघ्रता से लागू करें। संसद में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना देश की समग्र प्रगति के लिए अनिवार्य है। जब महिलाएं व्यवस्थाओं का हिस्सा होती हैं, तो सामाजिक एवं आर्थिक संरचनाओं में व्यापक परिवर्तन संभव होता है।

अंत में, हालत यह है कि महिला सांसदों और विधायकों की संख्या अत्यंत सीमित रहने के कारण महिलाओं के अधिकार और सुविधा संबंधी मुद्दे संसद और विधानसभाओं में समुचित जगह नहीं पा रहे हैं। महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने के लिए यह बेहद जरूरी है कि महिला आरक्षण विधेयक को दूरदर्शिता के साथ देखा जाए और जल्‍द से जल्‍द लागू किया जाए।

इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने और समाज को यह एहसास दिलाने की भी आवश्यकता है कि महिलाएँ सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि प्रभावशाली निर्णयकर्ता भी हो सकती हैं। तभी देश की राजनीतिक परिदृश्य में महिला प्रतिनिधित्व का गुणवत्तापूर्ण और количеात्मक सुधार संभव हो सकेगा।

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