नई दिल्ली। भारतीय लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी आज भी अपेक्षित स्तर से काफी कम है। पिछले आम चुनावों के दौरान संसद में महिला सांसदों का शेयर कभी भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं पहुंच पाया है। यह तथ्य महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न करता है।
वर्तमान में भारत के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिला विधायक या एमएलए की संख्या कुल विधायक सदस्यों में केवल दस प्रतिशत से भी कम है। इस आंकड़े से यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी आज भी व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाओं के कारण सीमित है। महिलाओं के लिए आरक्षण बिल को लेकर लंबे समय से बहस जारी है, लेकिन अब तक इसे पारित कर सत्ता में संतुलित भागीदारी सुनिश्चित करना चुनौती बना हुआ है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं को वांछित प्रतिनिधित्व देने के लिए न केवल आरक्षण बिल जरूरी है, बल्कि सामाजिक सोच में भी बदलाव आवश्यक है। पिछली संसदों में महिलाओं की संख्या कम रहने के कारण नीति निर्माण में उनके विचारों और मुद्दों का समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। इसके परिणामस्वरूप महिलाओं संबंधित नीतियां और कार्यक्रम भी अपेक्षा के अनुसार मजबूत या प्रभावी नहीं बन पाये हैं।
महिला आरक्षण बिल की लगातार मांगें इसलिए हो रही हैं ताकि संसद और विभिन्न विधानसभाओं में महिला सांसद और विधायक की संख्या बढ़ाई जा सके और वे समाज के विभिन्न वर्गों की जरूरतों को बेहतर तरीके से समझकर उनके लिए काम कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महिलाओं को लोकतांत्रिक संस्थानों में मुखर और प्रभावी भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक विकास और समानता के लक्ष्य अधूरे रहेंगे।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे लोकतंत्र में सभी वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व हो और महिला नेताओं को नीति निर्माण की प्रक्रिया में बराबर की भागीदारी मिले। इसके लिए संबंधित कानूनों और संरचनाओं में सुधार के साथ-साथ जागरूकता पैदा करना भी अत्यंत आवश्यक है जिससे समाज में लैंगिक समानता की भावना मजबूत हो सके।
