ब्लड टेस्ट में क्रिएटिनिन के बढ़े हुए स्तर को देख कई लोग चिंता में आ जाते हैं और सोचने लगते हैं कि कहीं उनकी किडनी खराब तो नहीं हो रही। अस्पतालों में मिलने वाली रिपोर्ट में एक बढ़ा हुआ क्रिएटिनिन लेवल किडनी फेलियर का संकेत हो सकता है, लेकिन क्या केवल इस एक नंबर से पूरी किडनी खराबी तय की जा सकती है? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है।
क्रिएटिनिन क्या है और क्यों बढ़ता है?
क्रिएटिनिन एक अपशिष्ट पदार्थ है जो शरीर की मांसपेशियों में सामान्य क्रियाओं के दौरान बनता है। स्वस्थ किडनी इसे खून से छानकर पेशाब के जरिए बाहर निकालती हैं। जब किडनी की कार्यक्षमता कम होती है, तो खून में क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ सकता है। हालांकि, हर बार क्रिएटिनिन बढ़ने का मतलब किडनी फेलियर नहीं होता। कभी-कभी शरीर में पानी की कमी, ज्यादा शारीरिक मेहनत, अधिक मांसपेशियां या कुछ दवाएं भी इसका स्तर बढ़ा सकती हैं।
नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार डॉक्टर एक बार की रिपोर्ट देखकर निर्णय नहीं करते। वे मरीज की उम्र, मांसपेशियों की मात्रा, पहले की रिपोर्ट, eGFR और पेशाब में प्रोटीन की जाँच भी करते हैं।
क्रिएटिनिन और eGFR टेस्ट से किडनी फंक्शन का आकलन
सीरिम क्रिएटिनिन टेस्ट खून में क्रिएटिनिन की मात्रा मापता है और किडनी की फिल्टर क्षमता के बारे में जानकारी देता है। अमेरिका के National Institutes of Health के अनुसार, वयस्कों में सामान्य क्रिएटिनिन रेंज लगभग 0.6 से 1.3 mg/dL होती है, लेकिन यह व्यक्ति के मांसपेशियों, उम्र और लैब की माप के आधार पर बदलती रहती है।
कम मांसपेशियों वाले बुजुर्गों में क्रिएटिनिन कम नजर आने पर भी किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इसके विपरीत अधिक मांसपेशियों वाले लोगों में क्रिएटिनिन थोड़ा ज्यादा होने के बावजूद किडनी ठीक हो सकती है। इसलिए, क्रिएटिनिन के साथ-साथ eGFR या Estimated Glomerular Filtration Rate देखना जरूरी होता है जो किडनी की एक मिनट में खून फिल्टर करने की क्षमता को दर्शाता है।
eGFR मान जितना कम होगा, किडनी की कार्यक्षमता उतनी ही कम मानी जाती है। 15 से नीचे की eGFR वैल्यू को किडनी फेलियर का संकेत माना जाता है, जिसमें डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की आवश्यकता हो सकती है।
क्रिएटिनिन बढ़ने का मतलब है कि किडनी फिल्टरिंग ठीक से काम नहीं कर रही, लेकिन इसका कारण तुरंत किडनी फेलियर नहीं होता। यह स्थिति एक्यूट किडनी इंजरी (Acute Kidney Injury) या क्रोनिक किडनी डिजीज (Chronic Kidney Disease) में भी हो सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि किडनी की कार्यक्षमता की जांच के लिए कई बार कम से कम तीन महीने तक रिपोर्ट पर नजर रखनी पड़ती है, और अचानक बदलाव हो तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह जरूरी होती है।
अंत में, विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ क्रिएटिनिन के स्तर को देखकर ही किडनी फेलियर का फैसला नहीं होना चाहिए। मरीज की पूरी रिपोर्ट, अन्य परीक्षण और लक्षणों को साथ में देखना आवश्यक है। यदि रिपोर्ट असामान्य हो तो डॉक्टर से सलाह लेकर ही इलाज या डाइट में बदलाव करें।
मुख्य बिंदु:
- क्रिएटिनिन बढ़ना किडनी खराब होने का संकेत हो सकता है, लेकिन अकेला आधार नहीं।
- eGFR किडनी की फिल्टर क्षमता मापने का बेहतर तरीका है।
- तीन महीने से अधिक किडनी की खराबी बनी रहे तो क्रोनिक किडनी डिजीज माना जाता है।
- डॉक्टर से सलाह बिना दवा या डाइट में बदलाव न करें।
