मुंबई, महाराष्ट्र
हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गीत हैं, जो अपनी कहानी, संगीत और फिल्मांकन के कारण दशकों बाद भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बने हुए हैं। अभिनेत्री मंदाकिनी पर फिल्माया गया ‘सुन साहिबा सुन’ भी ऐसा ही एक यादगार गीत है। साल 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ का यह गीत अपनी मधुर धुन और खूबसूरत फिल्मांकन के लिए आज भी याद किया जाता है।
‘राम तेरी गंगा मैली’ मंदाकिनी के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही। राज कपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में मंदाकिनी के साथ राजीव कपूर मुख्य भूमिका में नजर आए थे। फिल्म की कहानी के साथ इसके संगीत को भी दर्शकों ने काफी पसंद किया था।
लता मंगेशकर की आवाज बनी गीत की पहचान
‘सुन साहिबा सुन’ को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। लता की मधुर और भावपूर्ण गायिकी ने इस गीत को खास पहचान दिलाई। गीत का संगीत रवींद्र जैन ने तैयार किया था, जबकि इसके बोल मशहूर गीतकार हसरत जयपुरी ने लिखे थे।
गीत की सबसे खास बातों में इसका पहाड़ी लोक संस्कृति से जुड़ा फिल्मांकन शामिल था। इसमें पहाड़ी क्षेत्र की पारंपरिक वेशभूषा, लोक नृत्य और सांस्कृतिक परिवेश की झलक देखने को मिलती है। इस वजह से गीत में एक अलग तरह की दृश्यात्मक खूबसूरती नजर आती है।
मंदाकिनी के लुक और उनके स्क्रीन अंदाज ने भी गीत के प्रभाव को बढ़ाया। गीत में उनकी मौजूदगी और पहाड़ी परिवेश के बीच तालमेल ने इसे उस दौर के लोकप्रिय फिल्मी गीतों में शामिल कर दिया।
आज भी याद किया जाता है गीत
‘राम तेरी गंगा मैली’ के कई गीत लोकप्रिय हुए और फिल्म को एक म्यूजिकल हिट के रूप में पहचान मिली। फिल्म का संगीत रवींद्र जैन की खास शैली और उस दौर की लोकप्रिय गायकी का उदाहरण माना जाता है।
‘सुन साहिबा सुन’ में लता मंगेशकर की आवाज, हसरत जयपुरी के बोल और रवींद्र जैन का संगीत एक साथ नजर आता है। यही संयोजन इस गीत को लंबे समय तक यादगार बनाए रखने में अहम रहा।
करीब 41 साल बाद भी मंदाकिनी के इस गीत को पुराने हिंदी सिनेमा के प्रशंसक याद करते हैं। ‘सुन साहिबा सुन’ सिर्फ एक लोकप्रिय फिल्मी गीत नहीं, बल्कि उस दौर के संगीत और पहाड़ी सांस्कृतिक परिवेश की खूबसूरत प्रस्तुति के तौर पर भी अपनी अलग पहचान रखता है।
