मौत की सजा में फांसी या कोई और तरीका? सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

नई दिल्ली, दिल्ली

मृत्युदंड देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी बहस एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फांसी के बजाय कम पीड़ादायक तथा अधिक मानवीय तरीके अपनाने की मांग वाली याचिका पर 22 जनवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत के इस कदम के बाद अब यह मामला निर्णय की प्रतीक्षा में है।

यह याचिका अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा से संबंधित है। इसमें मौत की सजा को फांसी के जरिए लागू करने की मौजूदा व्यवस्था की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आधुनिक समय में मृत्युदंड लागू करने के ऐसे विकल्पों पर विचार होना चाहिए, जिनमें पीड़ा कम हो और व्यक्ति की गरिमा का सम्मान बना रहे।

याचिका में घातक इंजेक्शन समेत अन्य वैकल्पिक तरीकों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि मृत्युदंड लागू करने की प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

इस मामले में केंद्र सरकार का पक्ष भी महत्वपूर्ण रहा है। जनवरी 2026 की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार इस मुद्दे की उच्चतम स्तर पर जांच कर रही है। इसके बाद दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट इस मामले में वैकल्पिक तरीकों पर विचार के लिए केंद्र की भूमिका को लेकर सुनवाई कर चुका है। अक्टूबर 2025 में सुनवाई के दौरान अदालत ने पुराने तरीके में बदलाव की जरूरत पर सवाल उठाए थे। उस समय घातक इंजेक्शन को विकल्प बनाने या दोषी को फांसी और इंजेक्शन में से किसी एक को चुनने का विकल्प देने की मांग पर भी चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में मृत्युदंड के निष्पादन के लिए फांसी का प्रावधान है। हालांकि, फांसी की संवैधानिक वैधता और वैकल्पिक तरीकों को लेकर यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन रही है। इसलिए फिलहाल यह दावा करना उचित नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है या वैकल्पिक तरीकों को हमेशा के लिए नकार दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!