अक्षय कुमार और प्रियदर्शन ने एक बार फिर हॉरर-कॉमेडी की दुनिया में वापसी की कोशिश की है लेकिन उनकी यह नई फिल्म ‘भूत बंगला’ ग्राहक और दर्शकों के लिए पुराने जादू को वापस लाने में नाकाम साबित हो रही है। फिल्म की कहानी और प्रस्तुति दोनों इतनी औसत और पुरानी लगी कि यह ताजा मनोरंजन के बजाय उनके पुराने गौरव का एक थका हुआ प्रतीक नजर आती है।
‘भूत बंगला’ को देखकर यह स्पष्ट होता है कि प्रियदर्शन और अक्षय कुमार ने अपने पुराने फॉर्मूले पर इतना भरोसा किया कि वे कुछ नया करने से डर गए। फिल्म में हास्य का स्तर कहीं भी दर्शकों को हँसाने में सक्षम नहीं होता, बल्कि वह बार-बार दोहराए जाने वाले पुराने चुटकुलों का संग्रह मात्र लगती है। हॉरर एलिमेंट भी कमजोर लगे, जिसे देखकर लगता है कि वह भी अपनी जगह पूरी तरह से खरोंच से बनाई गई नकल है।
फिल्म की पटकथा काफी कमजोर है और संवाद भी दर्शकों को जोड़ने में असफल रहते हैं। अक्षय कुमार ने जहां फिल्म को कुछ ऊंचाइयां देने की कोशिश की है, वहीं प्रियदर्शन के निर्देशन में कुछ भी नया या रोमांचक नजर नहीं आता। दोनों ने अपनी पुरानी सफलता के सहारे इस फिल्म को ऊंचाइयों तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश नाकाम रही।
यह फिल्म उन लोगों के लिए शायद थोड़ी मनोरंजक हो, जो हॉरर-कॉमेडी की पारंपरिक शैली को पसंद करते हैं, लेकिन जो दर्शक कुछ नवीनता या ताजगी की उम्मीद करते हैं, उनके लिए यह निराशाजनक साबित होगी। ‘भूत बंगला’ को इस दौर की नई फिल्मों के साथ तुलना करना मुश्किल नहीं है, जहां नवीन कहानी, मजेदार संवाद और प्रभावशाली निर्देशन को प्राथमिकता दी जाती है।
समग्र दृष्टि से, ‘भूत बंगला’ एक थकाऊ और पुरानी शैली की हॉरर-कॉमेडी है, जिसमें अक्षय और प्रियदर्शन ने अपने पुराने युग की झलक फिर से पेश करने की कोशिश की है, लेकिन यह कोशिश सफल नहीं हुई। फिल्म शायद पुराने प्रशंसकों को थोड़ी राहत दे सकती है, लेकिन व्यापक रूप से इसे सिनेप्रेमियों द्वारा पसंद नहीं किया जाएगा।
