असम में भाजपा की जूनियर सहयोगी पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) को आगामी चुनाव में उतनी ही सीटें मिली हैं जितनी पिछली बार मिली थीं। हालांकि, आंकड़ों के गहराई से विश्लेषण से पता चलता है कि पार्टी अपनी जमीन धीरे-धीरे खो रही है।
एजीपी ने हमेशा से असम के राजनीतिक परिदृश्य में खास भूमिका निभाई है। भाजपा के साथ गठबंधन में पार्टी ने पिछली बार कुल 14 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इसी संख्या पर इस बार भी उनका दांव कायम है। लेकिन मत प्रतिशत और क्षेत्रीय प्रभाव के आंकड़े बताते हैं कि पार्टी की लोकप्रियता में कमी आई है। कई वहुमत वाले क्षेत्र जहां एजीपी को मजबूत पकड़ माना जाता था, वहां पार्टी के वोट शेयर में गिरावट देखी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि असम में राज्य की पहचान और स्थानीय मुद्दों के आधार पर गठबंधन की ताकत बनी रहती है। एजीपी का वोट बैंक इस गठबंधन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है और यदि यह कमजोर होता है, तो पूरे गठबंधन की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
स्थानीय रिपोर्टों और चुनावी सर्वेक्षणों के अनुसार, बांग्ला, बीपीएफ और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला भी बढ़ रहा है, जो एजीपी के वोट शेयर को और कमजोर कर सकता है। असम की राजनीति में जातीय और भाषाई गतिरोध भी पार्टी के लिए चुनौतियां पैदा कर रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री और एजीपी के वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी ने इस बार अधिक कड़क रणनीति अपनाई है, ताकि अपनी ज़मीन बचायी जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी की प्राथमिकता स्थानीय मुद्दों और युवाओं को जोड़ने पर है।
विश्लेषकों के अनुसार, एजीपी को अपनी भूमिका को फिर से संगठित करना होगा और बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ानी होगी ताकि वे अपनी उपस्थिति को मजबूत कर सकें। चुनाव के नतीजे ही स्पष्ट करेंगे कि पार्टी अपने वोट बैंक को पुनः जीवनदान दे पाती है या नहीं। फिलहाल, संख्या समान दिख रही है, लेकिन जमीन धसती जा रही है, जो आने वाले चुनावों की राजनीति के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में सामने आएगी।
