नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से बढ़ी भारत की चिंता, हिमालय की 200 संवेदनशील झीलों पर नजर

नई दिल्ली, दिल्ली

नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से आई अचानक बाढ़ की घटना ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। इस घटना के बाद हिमालयी क्षेत्र में मौजूद उन ग्लेशियल झीलों को लेकर सतर्कता बढ़ गई है, जिनसे भविष्य में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पैदा हो सकता है।

सरकारी और वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में हजारों ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से करीब 200 झीलों को संभावित रूप से जोखिमपूर्ण माना गया है। केवल सिक्किम में लगभग 25 झीलें अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखी गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने और भूस्खलन जैसी घटनाओं के कारण इन झीलों से खतरा बढ़ सकता है।

हिमालयी क्षेत्र में ऐसी झीलें अक्सर प्राकृतिक बर्फ, चट्टान और मलबे से बने बांधों के पीछे बनती हैं। यदि भारी बारिश, भूस्खलन या चट्टान गिरने से यह प्राकृतिक बांध टूट जाता है तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी निचले इलाकों की ओर बह सकता है। इससे बस्तियों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है।

भारत वर्ष 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील से जुड़ी भीषण आपदा का सामना कर चुका है। उस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में GLOF के खतरों को लेकर सरकार और वैज्ञानिक एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, नेपाल की हालिया घटना ने एक बार फिर समय रहते जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, लगातार निगरानी और प्रभावी चेतावनी प्रणाली की जरूरत को रेखांकित किया है। राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत संवेदनशील झीलों का आकलन किया जा रहा है।

सिक्किम आपदा के बाद केंद्र सरकार ने भी विभिन्न वैज्ञानिक और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। अब चुनौती यह है कि संवेदनशील झीलों की पहचान के साथ-साथ जमीनी स्तर पर चेतावनी और जोखिम कम करने की व्यवस्था को तेजी से मजबूत किया जाए।

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