Guwahati, Assam – पूर्वोत्तर भारत के सिनेमा ने वर्षों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हुए विश्वभर में दर्शकों का ध्यान खींचा है। यहां के अनुभवी निर्देशक से लेकर नए पीढ़ी के फिल्मकार भी अपनी कहानियों में क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक वास्तविकताओं को बखूबी उकेरते आए हैं।
यह क्षेत्रीय सिनेमा अपने गहरे और सटीक कथानक के लिए जाना जाता है, जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक चेतना फैलाने में भी मदद करता है। फिर भी, कई नामी निर्माता और डायरेक्टर इस क्षेत्रीय टैग को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे इसे अपनी कला की सीमित पहचान मानते हैं। उनका मानना है कि फिल्में केवल क्षेत्र की सीमाओं में सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें विश्व स्तर पर स्वीकार्यता मिलनी चाहिए।
पूर्वोत्तर भारतीय फिल्मों ने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवलों में पुरस्कार हासिल किए हैं, जो इस क्षेत्र के फिक्र और कला का वैश्विक स्तर पर सम्मान दर्शाते हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि उनकी कहानियां केवल स्थानीय दर्शकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी सार्वभौमिकता लोगों को जोड़े रखती है। इसलिए, यह जरूरी है कि इन्हें सिर्फ ‘नॉर्थईस्ट सिनेमा’ के रूप में बांध कर न देखा जाए।
फिल्मकारों का कहना है कि क्षेत्रीय टैग से ऊपर उठकर, उन्हें एक व्यापक मंच दिया जाना चाहिए जहां उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति और विचारों को सम्मान मिले। मीडिया और दर्शकों को भी इस बदलाव को समझना होगा ताकि ये कलाकार अपने काम को एक नए नजरिए से देख सकें।
समापन में, पूर्वोत्तर की फ़िल्म इंडस्ट्री सिर्फ क्षेत्रीय सिनेमा तक सीमित नहीं बल्कि वैश्विक सिनेमा की एक अहम कड़ी बनती जा रही है। इसलिए, इस क्षेत्र की फिल्मों को सिर्फ क्षेत्रीय पहचान नहीं, बल्कि विश्वव्यापी कला के रूप में स्वीकार करना चाहिए। यह बदलाव ही उनके विकास और बेहतर पहचान का मार्ग प्रशस्त करेगा।
