चंडीगढ़, पंजाब। सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी करण बीर सिंह सिद्धू ने फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया जाहिर की है। उन्होंने कहा कि यह फिल्म एक संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय पर आधारित है, लेकिन इतिहास को पेश करते वक्त उसकी पूरी सच्चाई, सभी पक्षों और संदर्भों को उचित रूप से दिखाना चाहिए। निष्पक्षता के बिना इतिहास प्रस्तुत करने से गलतफहमी और विवाद हो सकते हैं।
करण बीर सिंह सिद्धू ने बताया कि उन्होंने 1992 से 1996 तक अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर के रूप में कार्य किया। उस दौरान पंजाब मुश्किल समय से गुजर रहा था, जिसमें आतंकवाद और हिंसा की घटनाएं आम थीं। तत्कालीन प्रशासन और पुलिस ने राज्य में शांति बहाल करने के लिए कई अभियान चलाए, जिसके चलते हालात धीरे-धीरे नियंत्रण में आए।
उन्होंने विशेष रूप से जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण मामले का जिक्र किया, जो शिरोमणि अकाली दल के नेता और मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव थे। 6 सितंबर 1995 को उनके अचानक गायब होने की घटना ने पूरे पंजाब में सनसनी मचा दी। सिद्धू ने विस्तार से बताया कि इस घटना की जांच प्रशासन और बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने की, जिससे कई पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया।
करण बीर सिंह सिद्धू ने कहा, “फिल्म ‘सतलुज’ में यदि जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक प्रस्तुत की जा रही है, तो निर्माता उनका पक्ष दिखा सकते हैं। लेकिन यदि यह इतिहास दिखाने की कोशिश है, तो उसे संतुलित, निष्पक्ष और पूर्ण होना चाहिए। केवल एक दृष्टिकोण दिखाने से स्थिति जटिल और संवेदनशील हो सकती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब के अतीत में आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के दंगे और अनेक निर्दोष लोगों तथा पुलिसकर्मियों की बलि शामिल है। इसलिए इन घटनाओं को केवल एक पक्ष से देखने के बजाय समग्र नजरिये से देखना आवश्यक है ताकि नई पीढ़ी इतिहास को सही मायनों में समझ सके।
सिद्धू ने जोर देकर कहा कि आज का पंजाब शांति के दौर में है, इसलिए अतीत के दर्दनाक जख्मों को बार-बार कुरेदने के बजाय वर्तमान की चुनौतियों जैसे बेरोजगारी, नशा, कृषि संकट और सीमा सुरक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहिए। उनका सुझाव है कि यदि अतीत का निष्पक्ष अध्ययन आवश्यक है तो सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में ट्रुथ कमीशन बनाया जाना चाहिए जिससे सभी पक्षों का समुचित मुआयना हो सके।
उन्होंने सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म में सुझाए गए संशोधनों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बिना नियमन उपलब्ध सामग्री पर भी चिंता जताई। सिद्धू के अनुसार, सामाजिक और नैतिक प्रभाव को ध्यान में रखकर इतिहास को विकृत या पक्षपाती रूप से नहीं बल्कि संतुलित संदर्भ के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे न केवल इतिहास की प्रतिष्ठा बनी रहेगी बल्कि सामाजिक सौहार्द भी कायम रहेगा।
