कोलकाता, पश्चिम बंगाल: मई में बीजेपी की सत्ता में आने के बाद से राज्य के कई सरकारी भवनों, सड़कों और नागरिक संरचनाओं का रंग बदलना शुरू हो गया है। इस रंग परिवर्तन के क्रम में हाल ही में अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स के सुरक्षा कक्ष में केसरिया रंग की पेंटिंग को लेकर विरोध की लहर उठी है।
राज्य के विभिन्न हिस्सों में मौजूद सरकारी परिसरों और कार्यालयों की दीवारें अब नए रंगों से सजाई जा रही हैं, जिनमें विशेषकर केसरिया रंग को प्राथमिकता दी जा रही है। इस परिवर्तन को लेकर रंगमंच कलाकारों सहित कई कलाकारों ने चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि कला और संस्कृति के इस प्रतिष्ठित मंच को इस तरह के राजनीतिक रंग में रंगना उचित नहीं है।
कलाकारों ने बीजेपी बंगाल अध्यक्ष को पत्र लिखकर इस फैसले को तत्काल वापस लेने और कला संस्थान को अपनी आर्टिस्टिक आज़ादी देने की मांग की है। उनका कहना है कि कला किसी भी राजनीतिक रंग की मोहताज नहीं होती, और किसी भी तरह का रंग सामाजिक व सांस्कृतिक एकता के लिए बाधा नहीं बनना चाहिए।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यह रंग परिवर्तन एक व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर सौंदर्यात्मक बदलाव लाना है। इसके तहत नबन्ना समेत अन्य महत्वपूर्ण सरकारी भवनों की दीवारों, गलियों और सार्वजनिक संरचनाओं को नए रूपों में सजाया जा रहा है। अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस योजना के तहत चुने गए रंग विशेष सांस्कृतिक प्रतीकों और राजनीतिक पहचान के रूप में देखे जा रहे हैं।
वहीं, विपक्ष और स्थानीय समुदायों के कुछ वर्गों ने इस रंग परिवर्तन की आलोचना की है। उनका कहना है कि सरकारी परिसरों में रंगों के इस बदलाव से राजनीति का हस्तक्षेप स्पष्ट हो रहा है, जो कला और संस्कृति की संप्रेषण क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने शहर और राज्य के विभिन्न वर्गों में राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस छेड़ दी है। अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार, कलाकारों और नागरिक समुदाय के बीच इस विवाद का समाधान कैसे निकलता है।
