कोलकाता, पश्चिम बंगाल
वर्ष 2024 में निकोबार परियोजना से जुड़े ग्राम सभाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मामला कोलकाता उच्च न्यायालय में सुना गया। परियोजना को मंजूरी देने वाली ग्राम सभाओं में उपस्थित सदस्यों की संख्या को लेकर जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए, वे नियमों के अनुसार निर्धारित आधे हिस्से यानी 50% वयस्क जनसंख्या की उपस्थिति स्तर से काफी कम थे।
नियमों के अनुसार, ग्राम सभा में वैध क़्वोरम तभी माना जाता है जब कुल वयस्क जनता का कम से कम 50% उपस्थित हो। हालांकि अदालत में प्रस्तुत दस्तावेज़ बताते हैं कि ग्राम सभा में प्रतिभागिता मात्र 1% से लेकर 12% के बीच थी, जो जरूरी न्यूनतम स्तर से उल्लेखनीय रूप से कम थी।
यह तथ्य ग्राम सभाओं की वैधता व उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की कानूनी मान्यता पर सवाल खड़े करता है। ग्राम सभा एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जहाँ समुदाय के सदस्यों की बड़ी संख्या की उपस्थिति आवश्यक होती है ताकि लिए गए निर्णय सर्वसम्मति और न्यायसंगत माने जाएं। 50% क़्वोरम नियम का उद्देश्य यही सुनिश्चित करना है कि निर्णय सभी हितधारकों के प्रतिनिधित्व के साथ लिया जाए।
वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि ग्राम सभा में मात्र गिने-चुने सदस्य ही उपस्थित थे, जो समुदाय की व्यापक सहमति को प्रतिबिंबित नहीं करता। इससे यह भी चिंता उठती है कि क्या स्थानीय लोगों को परियोजना से जोड़े गए निर्णय प्रक्रिया में उचित भागीदारी मिली या नहीं।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ग्राम सभा की बैठकें नियमों के अनुसार क़्वोरम पूरी नहीं करती हैं, तो उनके निर्णयों की वैधता पर बातचीत हो सकती है। यह मामला जहां एक ओर ग्राम स्वशासन के मूल सिद्धांतों को चुनौती देता है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर विकास योजनाओं में समुदाय की भागीदारी को भी प्रभावित कर सकता है।
स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता और समुदाय की सक्रिय सहभागिता जरूरी है ताकि परियोजना से जुड़े सभी पक्षों के हितों की रक्षा हो सके।
कोलकाता उच्च न्यायालय इस मामले की बारीकी से समीक्षा कर रहा है और आवश्यकतानुसार आगे की कार्रवाई करेगा। निकोबार परियोजना की मंजूरी को लेकर इस विवाद ने क्षेत्रीय प्रशासन और परियोजना प्रबंधन के बीच भी संवाद की जरूरत को उजागर किया है।
संक्षेप में, ग्राम सभा की वैधता और उसमें न्यूनतम क़्वोरम की अनुपस्थिति से निकोबार परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं, जो न्यायालय, स्थानीय प्रशासन और समुदाय के लिए विचारणीय विषय हैं।
