नई दिल्ली, 27 अप्रैल 2024: लोकसभा में संशोधित महिला कोटा बिल की हार के बाद भी देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारण प्रक्रिया, जिसे डेलिमीटेशन कहा जाता है, पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर गर्माया हुआ है, क्योंकि इसके प्रभाव से राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव आ सकते हैं।
महिला कोटा बिल को संशोधित करके संसद में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य महिलाओं के लिए राजनीतिकrepresentation को सुनिश्चित करना था। लेकिन इस बिल को लोकसभा में अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और इसे अस्वीकृति का सामना करना पड़ा। इसके चलते महिला आरक्षण को लेकर संसद में और भी अनिश्चितता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डेलिमीटेशन प्रक्रिया के अधूरेपन के कारण ही यह बिल प्रभावित हुआ है। डेलिमीटेशन आयोग का काम निर्वाचन क्षेत्रों के सीमांकन का पुनर्निर्धारण करना होता है, जिससे प्रतिनिधित्व अधिक न्यायसंगत हो सके। हालांकि, इस बार आयोग ने कई विवादस्पद फैसले लिए हैं, जिनका राजनीतिक दलों ने विरोध किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाने के लिए डेलिमीटेशन की प्रक्रिया पूरी होना अनिवार्य है, क्योंकि नए सीमांकन के अनुसार ही सीटों का पुनर्वितरण संभव हो पाता है। इस प्रक्रिया के अधूरे रहने से महिला आरक्षण बिल पर कदम बढ़ाना कठिन हो गया है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि जल्द ही नई डेलिमीटेशन प्रक्रिया पूरी करने के लिए पहल शुरू हो सकती है और उसके बाद ही महिला कोटा बिल को पुनः संसद में पेश किया जाएगा। इसके साथ ही विपक्ष के नेताओं ने भी इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं और इसे जल्दी से जल्दी पूरा करने की मांग की है।
इस विवाद के बीच सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी बिल की हार पर चिंता जताई है तथा सरकार से आग्रह किया है कि महिला सशक्तिकरण के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि महिला आरक्षण ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे महिलाओं को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में सही प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो डेलिमीटेशन प्रक्रिया की अधूरी स्थिति और संशोधित महिला कोटा बिल की विफलता ने देश में राजनीतिक क्षेत्रों हेतु नए सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विषय अगले चरण की राजनीतिक बहसों और विधायी कदमों की दिशा तय करेगा।
