नई दिल्ली, दिल्ली
फ्लाईदुबई जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए विमानन विशेषज्ञों ने विदेशी एयरलाइनों के साथ काम करने वाले भारत में प्रशिक्षित पायलटों के लिए मजबूत मूल्यांकन और पृष्ठभूमि जांच व्यवस्था की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि विमानन उद्योग को बदलते और नए खतरों से निपटने के लिए कॉकपिट सुरक्षा उपायों का लगातार मूल्यांकन करना चाहिए।
विमानन सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विशेषज्ञ अरविंद सिंघटिया ने कहा कि भारत के बाहर संचालित होने वाली एयरलाइनों द्वारा नियुक्त पायलटों पर डीजीसीए की सीधी नियामक भूमिका नहीं होती। ऐसे मामलों में पायलटों की निगरानी, मूल्यांकन और नियामक अनुपालन की जिम्मेदारी उस देश के विमानन प्राधिकरण की होती है जहां संबंधित एयरलाइन का बेस होता है।
इस स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों ने भारत में प्रशिक्षित पायलटों के लिए मजबूत स्क्रीनिंग और मूल्यांकन तंत्र की जरूरत बताई है। पायलटों की पृष्ठभूमि, पेशेवर रिकॉर्ड और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच को प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है।
सिंघटिया ने कॉकपिट सुरक्षा के मौजूदा प्रोटोकॉल का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान विमानन प्रक्रियाओं के अनुसार कॉकपिट में हर समय कम से कम दो लोगों का होना जरूरी है।
यदि कोई पायलट किसी कारण से कुछ समय के लिए कॉकपिट से बाहर जाता है, तो उसके वापस आने तक केबिन क्रू के एक सदस्य का कॉकपिट में रहना आवश्यक होता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य कॉकपिट में लगातार निगरानी और सुरक्षा बनाए रखना है।
हालांकि, विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि कुछ ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जहां संभावित खतरा कॉकपिट के अंदर से ही उत्पन्न हो। ऐसी स्थिति में विमानन प्राधिकारियों को मौजूदा सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता पर दोबारा विचार करने की जरूरत हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, विमानन सुरक्षा व्यवस्था को केवल मौजूदा प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। नए जोखिमों के सामने आने के साथ सुरक्षा प्रोटोकॉल और मूल्यांकन प्रणालियों की नियमित समीक्षा जरूरी है।
विदेशी एयरलाइनों में काम करने वाले भारत में प्रशिक्षित पायलटों को लेकर उठी मांग का मुख्य उद्देश्य स्क्रीनिंग और सुरक्षा मूल्यांकन को अधिक मजबूत बनाना है। साथ ही, अलग-अलग देशों में नियामक जिम्मेदारियों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा से जुड़े तंत्र के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी सामने आती है।
