यूक्रेन युद्ध ने बदली सैन्य रणनीति: पोलैंड बनाएगा अपना ‘स्टारलिंक’, जानें भारत की तैयारी


वारसॉ, पोलैंड

रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्ध के कई पुराने समीकरण बदल दिए हैं। ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर क्षमताओं और सैटेलाइट आधारित संचार ने युद्धक्षेत्र की रणनीति में अपनी अहम जगह बना ली है। खासतौर पर सैटेलाइट संचार ने यह दिखाया है कि संकट के समय सुरक्षित और लगातार उपलब्ध कनेक्टिविटी कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी अनुभव से सबक लेते हुए पोलैंड अब अपनी स्वतंत्र सैन्य सैटेलाइट संचार व्यवस्था विकसित करने की तैयारी कर रहा है।

पोलिश प्रधानमंत्री डोनल्ड टस्क ने इस प्रस्तावित नेटवर्क को संभावित ‘पोलिश स्टारलिंक’ बताया है। उनका कहना है कि रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को करीब से देखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह स्पष्ट है कि संचार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में सैनिकों और कमांड सिस्टम के बीच लगातार संपर्क बनाए रखना निर्णायक हो सकता है।

आईसीईवाईई और पीजीजेड के साथ साझेदारी

पोलैंड ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए फिनलैंड की कंपनी आईसीईवाईई और राज्य नियंत्रित रक्षा कंपनी पीजीजेड के साथ साझेदारी की है। दोनों कंपनियों ने 9 सितंबर को कील्स में आयोजित एमएसपीओ डिफेंस शो के दौरान लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए।

इस योजना में आईसीईवाईई तकनीकी भागीदार की भूमिका निभाएगी। कंपनी प्रस्तावित सैटेलाइट आर्किटेक्चर विकसित करने के साथ उपग्रहों के निर्माण और संचालन में भी सहयोग करेगी। वहीं, पीजीजेड का ध्यान पोलैंड के घरेलू औद्योगिक आधार को तैयार करने पर होगा।

इस कार्यक्रम को 2026 से 2030 के बीच लागू करने की योजना है। पोलैंड का प्रस्तावित सिस्टम वितरित सैटेलाइट आर्किटेक्चर पर आधारित होगा। इसका उद्देश्य ऐसी क्षमता विकसित करना है, जिसे पोलैंड अपनी रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप स्वतंत्र रूप से विकसित और संचालित कर सके।

यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक का महत्व

यूक्रेन युद्ध में स्टारलिंक टर्मिनलों का व्यापक इस्तेमाल किया गया। यूक्रेनी सेना ने इनका इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में संचार बनाए रखने के साथ कुछ ड्रोन अभियानों के लिए भी किया। इसने यह दिखाया कि सैटेलाइट आधारित कनेक्टिविटी जमीनी संचार नेटवर्क के बाधित होने पर बेहद उपयोगी हो सकती है।

लेकिन इसी अनुभव ने एक रणनीतिक सवाल भी खड़ा किया। अगर किसी देश की सैन्य संचार व्यवस्था किसी बाहरी निजी सेवा पर निर्भर हो, तो संकट की स्थिति में उसके सामने निर्भरता का जोखिम बना रह सकता है। पोलैंड की नई योजना को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। देश अपनी संचार क्षमता पर अधिक नियंत्रण और रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करना चाहता है।

भारत की सैन्य सैटेलाइट क्षमता

भारत ने इस क्षेत्र में काफी पहले से तैयारी शुरू कर रखी है। भारतीय सशस्त्र बलों के लिए समर्पित सैन्य सैटेलाइट संचार क्षमताएं विकसित की गई हैं। इनका उद्देश्य सुरक्षित और रणनीतिक संचार नेटवर्क को मजबूत करना है।

भारत के लिए अंतरिक्ष आधारित संचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की भौगोलिक सीमाएं बेहद विविध हैं। ऊंचे पर्वतीय इलाकों से लेकर समुद्री क्षेत्र तक सैन्य बलों को भरोसेमंद संचार की जरूरत होती है। सैटेलाइट नेटवर्क ऐसी परिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भविष्य में भारत के लिए सैन्य संचार नेटवर्क को अधिक सुरक्षित, लचीला और जैमिंग जैसी चुनौतियों के प्रति मजबूत बनाना अहम होगा। साथ ही उपग्रहों, ग्राउंड स्टेशनों और सुरक्षित सैन्य नेटवर्क के बीच बेहतर एकीकरण पर भी जोर देना होगा।

पोलैंड की पहल से एक व्यापक रुझान साफ दिखाई देता है। अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान या व्यावसायिक इंटरनेट तक सीमित नहीं है। आधुनिक सैन्य शक्ति में सैटेलाइट संचार, सुरक्षित नेटवर्क और अंतरिक्ष आधारित निगरानी तेजी से रणनीतिक क्षमता का हिस्सा बन रहे हैं। यूक्रेन युद्ध ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है।

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