शिमला, हिमाचल प्रदेश – हिमाचल प्रदेश के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित एक विशेष स्टोलन-आधारित कटाई पद्धति अब दुर्लभ और आईयूसीएन सूचीबद्ध औषधीय जड़ी-बूटी ‘कुतकी’ के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इस नई तकनीक ने न केवल जंगली कुतकी की खेती को सुरक्षित बनाया है, बल्कि स्थानीय किसानों के लिए आय के नये स्रोत भी प्रदान किए हैं।
कुतकी, जिसे पारंपरिक चिकित्सा में अनेक रोगों के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है, हिमालयी क्षेत्र की एक कीमती जड़ी-बूटी है। परन्तु इसके अधिकतम प्राकृतिक संग्रहण के कारण इसके प्राकृतिक स्रोत तेजी से घट रहे थे, जिससे यह पौधा संकटग्रस्त हो गया था। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए, हिमाचल प्रदेश के कृषि और वन विभाग के वैज्ञानिकों ने इस स्टोलन-आधारित खेती की विधि को विकसित किया।
यह पद्धति कुतकी के प्राकृतिक वंश को बढ़ाने में सहायता करती है, क्योंकि इसमें पौधों के स्टोलन यानि क्षैतिज प्रसार वाले तने का उपयोग करके नए पौधे उत्पन्न किए जाते हैं। इस तकनीक से पौधे के जैविक विकास को बढ़ावा मिलता है, जिससे जोगी क्षेत्र की मिट्टी में भी इसका संरक्षण संभव हो पाता है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि इस नई विधि से न केवल उनकी आय में सुधर आया है, बल्कि उन्होंने जड़ी-बूटी के संरक्षण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी समझी है। उन्होंने बताया कि पहले वे जंगली कुतकी चोरी करते थे, जिससे इसकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती थी, लेकिन अब नियंत्रित और सतत खेती के कारण प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान नहीं पहुंचता।
राज्य सरकार ने इस पहल को समर्थन देते हुए किसानों को सुरक्षित बीज, प्रशिक्षण और कृषि उपकरण उपलब्ध कराए हैं ताकि वे इस तकनीक को अपनाकर बेहतर उत्पादन कर सकें। साथ ही, बाजार में कुतकी की मांग को देखते हुए, किसानों के लिए यह एक स्थायी व्यवसायिक विकल्प बन गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सतत खेती के इस मॉडल से हिमाचल Pradesh जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में जड़ी-बूटी संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, इससे स्थानीय जैवविविधता भी संरक्षित होगी, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है।
अंतत: यह तकनीक हिमाचल प्रदेश के किसानों और पर्यावरण के लिए एक लाभकारी पहल साबित हो रही है, जो न केवल पारंपरिक और आयुर्वेदिक चिकित्सा को बढ़ावा दे रही है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी वृद्धिदायक है।
