चेन्नई, तमिलनाडु – राजनीतिक गलियारों में यह खबर लगभग एक माह पहले चर्चा में आई कि इंदिरा गांधी सरकार विपक्ष द्वारा शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर सकती है। यह संभावना 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा स्थापित उदाहरण के कारण जोर पकड़ रही थी। इस संदर्भ में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंदरन (एमजीआर) ने इस तरह की अटकलों को केवल ‘‘अटकलें’’ बताते हुए खारिज कर दिया।
एमजीआर ने कहा कि इस समय ऐसी कोई योजना या निर्णय नहीं है और इसे मीडिया और राजनीतिक सट्टेबाजों द्वारा फैलाया गया अफवाह माना जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की स्थिरता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का सम्मान उनकी प्राथमिकता है।
1977 का इतिहास याद किया जाए तो उस वर्ष जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने विपक्षी शासित राज्यों की सरकारों को अस्थिर मानकर बर्खास्त करने का कदम उठाया था, जिसकी आज भी राजनीतिक चर्चा होती है। इसी को लेकर हाल ही में तमिलनाडु सहित विभिन्न राज्यों में इस दिशा में कदम उठाए जाने की चर्चा शुरू हुई थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह की अटकलें मुख्य रूप से केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ाने और विपक्षी दलों को कमजोर करने के सरकार के प्रयास के तौर पर देखी जा सकती हैं। वहीं, एमजीआर के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि वे अपने शासन को लेकर आश्वस्त हैं और किसी भी तरह के अवैध हस्तक्षेप का सामना करने के लिए तैयार हैं।
राजकीय सूत्रों ने यह भी कहा कि सभी राज्यों की सरकारें संविधान के दायरे में कार्य कर रही हैं और केंद्र की ओर से किसी भी ऐसे कदम की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का अधिकार चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से ही होता है और अन्य तरीकों को सहन नहीं किया जाएगा।
तमिलनाडु के लोगों ने एमजीआर की स्थिरता की दिशा में उनके प्रयासों की सराहना की है और उम्मीद जताई है कि राज्य में विकास और सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम बिना किसी बाधा के चलते रहेंगे। अभियानों के दौरान भी एमजीआर ने जनता के साथ मिलकर काम करने तथा स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया था।
इस पूरे घटनाक्रम को देखने वाले राजनेता और विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मज़बूत बनाए रखने के लिए राजनीतिक स्थिरता आवश्यक है। एमजीआर के स्पष्ट शब्दों ने राजनीतिक अनिश्चितताओं को कम करने में मदद की है और राज्य में सकारात्मक माहौल कायम रहेगा।
इससे साफ होता है कि 1977 के उदाहरण के दबाव में आने के बजाय वर्तमान सरकारें अपने कार्यकाल में बढ़-चढ़ कर काम करेंगी और लोकतंत्र की जाँच-पड़ताल के रास्ते खुलेंगे। तमिलनाडु समेत देश के अन्य राज्यों में इस पर निगरानी हाथों-हाथ बनी रहेगी।
